श्रीहरिः ॥ गीताप्रेस, गोरखपुर · सन् १९२३ से
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श्रीमद्भगवद्गीता · श्रीरामचरितमानस · पुराण · कल्याण
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श्रीमद्भगवद्गीता
आज का श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत बन और अकर्म में भी तेरी आसक्ति न हो।
— श्रीमद्भगवद्गीता 2.47
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