गीता साधक संजीवनी श्री स्वामी श्रीरामसुखदास जी द्वारा | भाषा: असमिया | कोड: 2277
श्रीमद्भगवद्गीता (श्रेणी)विवरण
श्रीमद्भगवद्गीता – साधक संजीवनी भगवद गीता की सबसे गहन और व्यापक रूप से सम्मानित व्याख्याओं में से एक है, जिसे आधुनिक भारत के प्रसिद्ध संत और दार्शनिक स्वामी रामसुखदास जी ने लिखा है।
गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, इस संस्करण में श्लोक असमिया में, उनका अनुवाद और विस्तृत टीका शामिल है, जो भगवान कृष्ण की शाश्वत बुद्धि को व्यावहारिक और आसान समझ में आने वाले तरीके से समझाती है।
साधक संजीवनी शब्द का शाब्दिक अर्थ है “साधकों के लिए जीवन अमृत,” और यह टीका वास्तव में पाठकों की आध्यात्मिक चेतना को पुनर्जीवित करती है। यह भक्तों (साधकों) के लिए जीवन की चुनौतियों को पार करने, कर्म को समझने और दिव्य सद्भाव में जीने का मार्गदर्शन प्रदान करती है।
स्वामी रामसुखदास जी की भगवद गीता पर संपूर्ण टीका, असमिया में अनूदित, गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित — आध्यात्मिक खोजकर्ताओं और भक्तों के लिए जीवन बदलने वाला मार्गदर्शक।
मुख्य विशेषताएँ:
• श्री स्वामी श्रीरामसुखदासजी की व्यापक टिप्पणी का असमी में अनुवाद—स्पष्ट, भक्तिपूर्ण और व्यावहारिक।
• असमी पाठ के साथ अर्थ, जो इसे अध्ययन, शिक्षण और दैनिक चिंतन के लिए आदर्श बनाता है।
• गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, भारत के हिंदू आध्यात्मिक साहित्य का सबसे प्रामाणिक स्रोत।
• कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग जैसे प्रमुख सिद्धांतों को समझने योग्य ढंग से स्पष्ट करता है।
• साधकों, छात्रों और आध्यात्मिक दर्शन के पाठकों के लिए जीवन बदलने वाली पुस्तक।

